Showing posts with label मेरी उलझन. Show all posts
Showing posts with label मेरी उलझन. Show all posts

Thursday, August 20, 2009

Likh de Mujhe ...

देखा कोई खाली पन्ना
खूब उतारा मैंने लिख
सोचूं मैं ख़ुद हूँ कोरा
मेरा बिम्ब नक़ल हो जैसे
अब मिले कोई ऐसा
जो लिख दे मुझे ...

खामोश मैं रहूँगा
कभी कुछ ना कहूँगा
मेरी जबान वो आंखे
देखे और कह जाए
वो लफ्ज़ जो अनकहे है
और बस लिख दे मुझे ।

करीने से सजी है यंहा
कांच की ये टुकडियां
खुब चमक ही चमक
थोड़ा ऊपर से जो गिरे
वो टुकड़े और थोडी छनक
हु मैं भी अब और हमेशा बिखरा
हो जो समेटे और लिख दे मुझे।

प्यास भी अजीब होती है
लगे तो नाश करती है
बुझी तो मीठी कयास बनती है
वो ओस की बूंद जो रहे
हर तिरछी तीखी कोर पे
जो उतरे तो लिख दे मुझे।

गुमराह हो अंधेरे मैं
भटक के जो घूमता हूँ
खूब रौशनी है मेरे पास
क्यों करूँ पता है कंहा मुड़ना
वो आए और मोड़ बदल दे
रौशनी हो और लिख दे मुझे।

आस के गीत जो गाऊं
क्या सोच हो गई ऐसी
सोचूं कोई जोड़ ना बांधू
फिर भी मचल जाता हूँ
हर आशा का निर्णय होता है
पर धीरज की डोर मैं
मुझे बांधे और लिख दे मुझे।

मेरी पीडा ना कोई नयी
ऐसी जैसे औरों की पीर मैं
जैसे मैं तकूँ वो भी ताकें
सोचे उसे जो उनमे झांके
नही है तो बनाये उसे जाके
वो जो सब हर ले और लिख दे मुझे।

सुख के कंठ हार गए
शायद अब कुछ ना मांगे
गीत वो जो कभी थे सुरीले
बिन साज मैं क्या गाऊं
खोजु वो राग जो यंहा है
बस ताल दे और लिख दे मुझे

...पारस

Thursday, March 26, 2009

On My Own ....

सोचता हूँ आज फिर लिखूँ , बहुत दिनों बाद फिर कुछ सीखूं,
जब मैं प्रयत्न करता हूँ, तो सोचकर बहुत कुछ चलता हूँ,

मेरे हृदय में फिर भूचाल है, खैर चलता हूँ हरदम साथ लेकर
हो न हो कोई यहाँ, मैं चलूँगा ऐसे ही ,सम्भव सब साथ लेकर

विचारो की माया में उलझने से बेहतर नही विचार शुन्य होना
खैर उलझकर सुलझाने में ही छिपा शुन्य से अनंत होना

कड़ी धुप में बग्घी पगडण्डी पर चलती हुई, रेत के गुब्बार में
खांसते हुए उस को देखकर, मैं सोचता हूँ, रेत के गुब्बार से
कुछ फरक है, या नही , किसी को अहसास नही, क्यों सोचो तो
एक जो चले अन्दर, दोनों विचार शुन्य, एक धुल के अन्दर
एक तो चलता गया, एक जो सहता गया, आदत है सबको

मैंने पहले ही कहा था, ये तो सीखने के लिए लिखा था,
मिला न कोई तुक तो, क्या हुआ ऐसे ही तो सिखा था

लिखते हुए अगर कुछ भी न मिला तो क्या, विचार देख
बस लिखा और लिखा,शब्द मैं क्यों उलझे , विचार देख

मैं तो परिवर्तन की वकालत करता हूँ, कोई क्रांति नही,
बस सुलझन से परिभाषित करता हूँ, कोई भ्रान्ति नही

जब शुरू हो जायें तब मुश्किल इतनी सी, चलना तो होगा
मैंने भी पुनः पंक्तियों को देखा, यही सोचा, इनका अंत कहाँ होगा

कलम तो ऐसे ही चलती रहेगी, सोचते हुए भी सब सहती सहेगी
चलो केवल उसी का बलिदान लो, मिले संबल तो कहती रहेगी

कारवां में चलना एक ही दिशा में , मिलें हवाओं के कितने रुख
यूँही यंहा परिभाषाओ मैं उलझे रहें , तो जीवन का क्या सुख

भोग और उपयोग मैं बहुत फरक है, भोग तुम करो तो
उपयोग तुम करो तो, तुम्हारा ही रहेगा,फिर न तुम रहो तो

सबके साथ सफर में कितने है, मेरा रास्ता मुझे तय करना
मेरे रास्तें , थोड़ा तेज़ चलना होगा, जब अकेले ही चलना

कितना कुछ सिखा अभी, मंथन कर और कर दे सही
वो जो अब गलत है, और वो भी जो कभी न था सही

बनकर राही और रास्ता, सब तय कर लूँ अभी से, हाँ अभी से
प्रेम मिले तो त्याग सीखूं, त्याग हो तो प्रेम से करूँ, हाँ अभी से

भ्रमित मत हो बंधू, उलझन की इक डोर में ही सब कुछ समाया
तो सुलझाना शुरू कर अगर मेरे सिवा और किसी ने भी उलझाया

..paras





Wednesday, November 12, 2008

Mujhe Azad Karo..

मेरी बगिया में एक फूल खिलता है
क्या कहूँ हर पल जो सुकून मिलता है

महक जो बहती रहे उसकी हवा के संग
चलता चलूँ मदमस्त वहीं बन मद पतंग

काश मैं वो कीट बनूँ जो हर पल आजाद है
उड़ता हुआ जो जा बने जहाँ उसकी सुगंध आज है

मेरे विचारों की एक समीक्षा है ये कुसुम
बस मेरी मुस्कुराहट मैं बिखरे ये मासूम

बिखरी हुई महक के कितने ही पक्ष गुप्त है
कैसे रहूँगा इसके बिना जब और जहाँ ये लुप्त है

बगिया कितनी बड़ी है जहाँ और भी महक रहे
पर इस महक की मिठास में मेरा हर पल रहे

दूर जब था तो केवल देखकर खुश न था
इसी कोमल सामीप्य के लिए कितना आतुर था

अब जब इन हथेलियों के बीच वो कोमल अहसास है
तो क्या, अन्तिम पंखुडी बची हुई मेरे पास है
है तो मुरझाई हुई पर मेरे लिए कुछ खास है
शायद नयन बंद करने है और वही फूल मेरे पास है ..........