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Wednesday, May 19, 2010

मनु मानस

आँखों के बंद दायरे में
कोई अहसास सा ना है
बस एक मुस्कान की चमक
दिल में घर कर जाती है...

जब मेरी परछाई मुझसे घबराती है
एक गुम्बद सर पे आ बनता है
इतना बड़ा इतना विशाल
फिर सूरज की तपन मिट जाती है ...
परछाई नहीं, उसकी शीतल मिल जाती है

आती हुई आंधियों के डर से
जब घबरा के आंखे बंद कर लेता हूँ
एक नरम मुस्कान बारिश बन आती है
फिर आंखे खुली होती है बहती हुई आंधी में
बरसी हुई रेत ... एक महक बन जाती है

आते जाते बवंडरो में डर लगता है
उनसे मिलके खुद की हस्ती गुम ना हो जाए
पकड़ के उसका सहारा, वही रहता हूँ बनके
खुद एक बवंडर, फिर कितने आये जाए...
घुमाव कितने घुरीले, खुद एक लकीर बन जाती है ।

.. पारस

Thursday, December 31, 2009

ओझल भ्रम

रहेगी दुनिया यही... भ्रम का कहना
खुद में होके, भ्रम में होके
असल लगे... जीले उतना उतना...
और औरों से होके, उनका जो मिले
मिलाके उसे, खुद को बुनना
धीरे धीरे अपनी एक डोर बन जाएगी
भ्रम में ही सही जिन्दगी....... कुछ तो कह जाएगी ।

डर भी हरदम साथ रहता है
कभी किसी से अपने आप लगता है
स्वयं की परिभाषा कम पड़ जाती है
डर उसी कमी की छाप चढ़ता है
सुखा रंग पानी में मिलके जैसे चढ़ आये
ऐसा ही कुछ सुखा मन के कोने में रह जाये
हल्की सी हवा काफी है... फिर मत सोचो उसे...
बस कोरे मन पर लिखना अब रह जायेगा
लिखना वहां कुछ ऐसे.... तो डर अपने आप उड़ जायेगा


Happy New Year..
..paras

Tuesday, November 10, 2009

सृजन

खूब जाता हूँ गहराई तक
क्या फायदा साथ ना रोशनी
इस बार वापिस आया हूँ
लेकर जाऊंगा, बस उतनी
जिस से रोशन हो जाए
वो गहरा गर्त जिसमें जाना होगा ।

मिलती है खूब परछाइयाँ मुझे
संग मेरी चलती है ख़ुद मेरी
हर वक्त ताकती है बिन आँखों के अपलक
जहाँ जितना चलूँगा साथ चलेगी..
ना चाहूँ.. तो अंधेरे में भी चलना होगा !

खूब बिखेरा है ख़ुद को यहाँ
अब टुकड़े ख़ुद बोलतें हैं जोड़ दो हमें
समेटने की मेरी ये कोशिश
कटिबद्ध परन्तु कुछ मिल नही रहें
शायद कुछ ... या एक जो किसी और के पास होगा !

पहुँच यहाँ अब मैं सोचता हूँ
कितना आसान था सब करना जो किया
मुश्किल अब भी वही है
पर पहुँच वहां , जहाँ अब चाहता हूँ
शायद फिर यही सोचूंगा !

साथ मेरे कौन है... कोई साबुत ??
नहीं ... वो टुकड़े जो मेरे है
समक्ष बिखरे हुए .... हर एक की कहानी है
अब भी जो सोचूं, ना कोई आने वाला
समेटना भी ख़ुद मुझे होगा !

अन्दर की परिभाषा भी कहती है बदलो मुझे
बड़ा मुश्किल है हर बार , बार बार
कुछ ऐसा बदलना जो फिर बदलेगा
क्यों न कुछ ऐसा बनाऊं
जो स्वयं पर हो, ना किसी साबुत पर होगा !

तब उन चंद टुकडों की संग शक्ति मिलेगी
वो मेरे आईने है, अलग अलग ...
जब मेरे साथ होंगे , तो हर दम पास होंगे
सब कुछ कर दूंगा, सोचा था जो चाहा था
फिर वो साबुत इस बिखरे को आन मिलेगा !

बड़ा मुश्किल होता है, संग सब साथ ले चलना
सब यही छोड़ रहा हूँ, कुछ ना जाएगा... खैर
कुछ एक तो हर वक्त है, जिन्हें मैं ख़ुद बना दूँ
मेरी कला मेरी परछाई से बढ़कर है
न मांगे रोशनी, बस एक अधीर सकल मन होगा !

जब जो करूँ , सोचूं की वो मेरा है
किसी को ना देखूं, क्योंकि ये मेरा है
जैसे तैसे ऐसे सोचूं की मेरा है
फिर जब सब बन जाएगा ..... तब रहना सदा ही मेरा है !

..पारस

Monday, July 6, 2009

मेरी पाठशाला (अपेक्षा)

इच्छा मेरी, दुखों की जननी
सीख के मैंने, कर के जानी
धुप में खिले, रंगों की रानी
इच्छा करूँ, मेहनत से पाऊ

बिन समय, जब जो सोचूं
कमजोर मैं, किस्मत कोसु
तोड़ अपेक्षाएं, खड़ा होके
तिनका तिनका, गढ़ता जाऊँ

जब सोचा, लालसा को पकड़ा
मेरा बंधन, मुझी से अकडा
इतना भोला, कभी ना जाना
अब जब सोचा, तो खुल जाऊँ

अपेक्षा मेरी, मैं जानू
करू मैं, भरू ही मैं
किया जिससे, वो क्या ले
तोडके उस से, मुझ को बनाऊ

मुक्त विधा में, कला आएगी
असंभव काम, कर वो जायेगी
विधा मेरी, मेरे अन्दर
खूब सोचा, अब कोर ही जाऊँ

शंका सबकी, इतनी छोटी
चींटी जैसी, सूंड में डोले
छींक डालू, तीव्र वेग से
जब मिटे, आशा भर जाऊ

जो कुछ न होगा, भरूँगा क्या
जीवन मिला, और अपेक्षा क्या
मैं एकल, सब को समेट
केवल ज्ञान, विरल हो जाऊँ

सबकी अभिलाषा, गवाक्ष खोले
जितना अन्दर, वही ढप डाले
शंका सबकी, पूरण काज में
छोड़ अपेक्षा, कर्म को जाऊ..

paras...

Saturday, April 4, 2009

मेरी पाठशाला

मैं शांत, बस झांक
मैं निर्मल, अनंत भान
अन्दर गहरा , बाहर कोरा
मैं जीयू , यही कोरा
अनंत अपार फिर भी थोड़ा !

मैं जागूँ , या सो जाऊँ
जब सोचूं , तो खो जाऊं
खुल ऐसे, साज के जैसे
जब निकलू, चमक बन जाऊँ

तेज भी, मंद भी ना
बस प्यारा, मन को सोखे
जब मिलूं, तो मिलकर ऐसे
उसी का जैसे, बस घुल जाऊँ

प्रेम देखा, चल चलूँ
आवेग झोंका, सह चलूँ
मैं पावन, मैं निर्मल
जो कठोर, कोमल बन जाऊँ

शब्द ऐसे, फूल हो जैसे
कोमल पंख, पखेरू ऐसे
वो उडे, तो अभिलाषा आए
कोशिश करूँ, मैं उड़ जाऊँ

शंख नाद, कोरु जो आज
बीता दिया, गया वो आज
आएगा क्या, सोच लूँ आज
मनन ऐसा, कर कर जाऊँ

एक पल, और हो एक विचार
दूजा क्या, जानूं एक औजार
मन क्या, एक कोरी पट्टी
सफ़ेद चाक, मैं भर जाऊँ

घोर घटा, जब छायेगी
देखते -२ , बारिश आएगी
अँधेरी -२ , चमके बिजली
वो तो भ्रम, समझता जाऊँ

लिखकर ऐसे, मैं सीखूं
सुनकर ऐसे, मैं सोचूं
जब तैयार, तब चलूँ
फिर प्रयास , करता जाऊँ


मैं तरंग, तीव्र प्रचंड
देख किनारा, उछल उछल
और आगे, तो कोरी धुल
चलता चलूँ , ना रुक जाऊँ

बन सहारा, कुछ देकर
लिया तो सब, अब कुछ देकर
करके ऐसे, त्याग में जैसे
प्रेम तो उसमें, बस तर जाऊँ.....

..paras